पिता
पिता
पिता परमात्मा नहीं है,अपितु
कहीं परे है परमात्मा से,
परमात्मा होना सरल है
पिता तप कर बनता है
कितना? कहना कठिन है
अपरिमेय है
तप्त होना जब तक के
निज परमत्व को गला न दे
किसी परमात्मा के वश से बाहर है....
अपने परम तत्व को त्याग कर
जब वह अपरम हो जाता है पिता कहलाता है
और नन्हे परमात्मा बच्चे बनकर आते हैं पिता की पनाह पाने।
