फर्क यहां है
फर्क यहां है
कुछ लोग हिंदू-मुसलमान करते हैं,
कुछ लोग मुसलमान-हिंदू करते हैं।
कुछ कोसते हैं धर्म की दीवारों को,
कुछ कहते हैं मज़हब ही दीवार है।
कभी मंदिर-मस्जिद पर झगड़ते,
कभी मस्जिद-मंदिर में बंट जाते।
कोई कुरान के पन्ने गाता,
कोई गीता के गीत सुनाता।
कोई कहता अब्दुल ने काटा,
किसी को अमर ने मारा चांटा।
कोई हलाल से दूर भागता,
कोई झटके को हाथ न लगाता।
मगर सच में,
दर्द एक है, तकलीफ एक है।
नमाज़ में जो हाथ उठते हैं,
वही आरती में जुड़ जाते हैं।
जो आंखें काबा को देखतीं,
वही बद्रीनाथ को निहारतीं।
जो लहू हुसैन का रोता,
वही राम वनवास पे सिसकता।
रंग एक हैं, सूरज एक,
एक हवा है, सांसें एक।
फर्क नहीं दिल की धड़कन में,
फर्क दिल की आवाज़ में है।
फर्क है प्यार में और फर्क,
नफरत बजा रहे साज़ में है।
