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विनोद महर्षि'अप्रिय'

Inspirational

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विनोद महर्षि'अप्रिय'

Inspirational

फलक पर

फलक पर

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धरा पर पैर रख क्यों

आसमान को ताकता है

स्वयं को तो परख ले तू

गैर की गिरेबाँ में झांकता है।


गर जाना ही है तुझे

फलक के उस पार

भर जोश तेरे शोणित में

क्यूं खुद को कम आंकता है।


यह राहै है कंटक भरी

खुशबू सा इसे महकने दे

चल अटल निश्चय से तू

उपवन सा इसे चहकने दे।


तेरे लहू में है वो रवानी

उफान में है तेरी जवानी

चल उस पथ पर अब

मंजिल ही तो है कहानी।


धर्म-कर्म रीत सब भूल

तू लगा धरा को बांटने

कौन सही दिशा दे तुझे

भेद की खाई पाटने में।


तू चल पथ पर बस नेकी से

ना भूल कर्म देखा देखी से

गर तुझे आसमाँ नापना है

स्वयं को कम नही आंकना है।।


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