फिर तेरी कहानी याद आई
फिर तेरी कहानी याद आई
फिर तेरी कहानी याद आई,
मैंने फिर से तुझे कविता बनाई।
फिर से तुझे मैंने अपने शब्दों में पिरोया ,
फिर से तेरी याद में अपनी पलकों को भिंगोया।
फिर से तेरा रूप मैंने अपने दिल में सजाई ,
अपनी अल्फ़ाजों से श्रृंगार किया तेरा फिर एक बार ।
मैंने फिर से तेरी वह मधुर मुस्कान तेरी होठों का अपनी होठों से मुस्कुराई।
मैंने फिर से अपनी दिल में तेरी छपे तस्वीर को बार- बार दुहराई,
एक तू ही तो है वो मेरी दिल- रुबाई ,
जिसके छांव तले मैं सूनेपन में भी सुकून-ए- आशियां है पाई ।
मैंने फिर से अपनी अल्फ़ाजों में तेरी आवाज़ को एकाकी में भी महफिल लगाकर है गुनगुनाई।
हाँ ! फिर से तेरी कहानी याद आई।
मैंने फिर से तुझे अपनी कविता बनाई।
गीत बनाया तुझे ही ,
मेरी गज़लों में फिर से तु है आई ।
इस शायर की नायाब शायरी है तु ,
शरारत तेरी फिर से मुझे याद आई ।
मैंने फिर से वही नटखट अंदाज तेरी निश्छल प्रेम में भी पाई ।
मैंने फिर से वह न्यारी नटखट परी को अपनी दिल में छुपाई।
तू मुझे जब - जब याद है आई ,
मैं तुझमें समाकर तेरी यादों को चुराकर,
बिताये गए संग साथ लम्हों को फिर से मैंने अपनी कविता में है गाई।
फिर तेरी कहानी याद आई ।।

