फिर क्यों !
फिर क्यों !
दर्द के साथ पला बड़ा हुआ हूँ
फिर क्यों
इनसे क्यों जुदा होना चाहता हूँ !
साहस और हौसले से लबरेज़ हूँ
फिर क्यों
परेशानियों से निज़ाद चाहता हूँ !
इस नफ़रत भरी दुनिया में प्रेम हूँ ,
फिर क्यों
मोहब्बत से जुदा होने से डरता हूँ !
सच्चाई को अपने दिल में पनाह देता हूँ
फिर क्यों
दुनिया की कड़वी सच्चाइयों से डरता हूँ !
आज का ये वक्त यूँ ही बिता देता हूँ
फिर क्यों
कल आने वाले वक़्त से मैं डरता हूँ !
प्रेम हूँ और अपनी प्रीत को साथ रखता हूँ
फिर क्यों
मैं इन रातों की तन्हाइयों से डरता हूँ !
