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S Ram Verma

Abstract

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S Ram Verma

Abstract

फिर क्यों !

फिर क्यों !

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दर्द के साथ पला बड़ा हुआ हूँ 

फिर क्यों

इनसे क्यों जुदा होना चाहता हूँ !


साहस और हौसले से लबरेज़ हूँ

फिर क्यों

परेशानियों से निज़ाद चाहता हूँ !


इस नफ़रत भरी दुनिया में प्रेम हूँ ,

फिर क्यों

मोहब्बत से जुदा होने से डरता हूँ !


सच्चाई को अपने दिल में पनाह देता हूँ 

फिर क्यों

दुनिया की कड़वी सच्चाइयों से डरता हूँ !


आज का ये वक्त यूँ ही बिता देता हूँ 

फिर क्यों

कल आने वाले वक़्त से मैं डरता हूँ !


प्रेम हूँ और अपनी प्रीत को साथ रखता हूँ 

फिर क्यों

मैं इन रातों की तन्हाइयों से डरता हूँ !


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