STORYMIRROR

Dr. Kalpana Pandey

Tragedy

3  

Dr. Kalpana Pandey

Tragedy

पैबंद

पैबंद

1 min
254

उधड़ी हुई सिलाई की तुरपन में

चुभती हुई सुई का दर्द 

फ़िर भी उम्मीद में बार-बार कोशिश 

न झाँके कोई खुला कोना 

टूटते धागों की जोड़ में 

हर बार रिश्तों पर लगे पैबंद 

उनकी गाँठों में कहीं न कहीं 

छूट ही गया भरोसा हर बार।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

More hindi poem from Dr. Kalpana Pandey

पैबंद

पैबंद

1 min पढ़ें

सुख

सुख

1 min पढ़ें

Similar hindi poem from Tragedy