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Rekha Shukla

Abstract

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Rekha Shukla

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पायल

पायल

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शोले उठ्ठे पानी में तरन्नुम बजने लगी

सांझ छेड चली उंगलियां चुभने लगी


टिपटिप गिरी बूँदें सांझ ढलने लगी 

फिर स्थिर कंकर वर्तुल करने लगी


शाम की पायल खननन बजने लगी

वादा निभा गई रात पागल करने लगी!


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