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Vivek Gulati

Abstract

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Vivek Gulati

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ओस की बूँदें

ओस की बूँदें

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हरी घास पर बिछी मोतियों की परत,

मौसम में आया बदलाव, आई ऋतु शरद |

फूल पत्तों ने पहने आभूषण, 

दृश्य ऐसा अलौकिक... कवि करें वर्णन |

धूप जब ओस की बूंदों से टकराए,

मानो असंख्य दीपक एक साथ जगमगाए |


रात के अंधेरे में चुपके से जन्म लेती हैं,

सुबह की पहली किरण पर मोतियों-सी चमकती हैं।


हरी पत्तियों की हथेली पर जैसे ठहरी हों दुआएँ,

धरती के आँचल में बसती छोटी-छोटी अप्सराएं।


हर कली के माथे पर थिरकी नन्ही मुस्कान लगें,

पत्तों की गोद में ठहरी बूंदें सुंदरता का दान लगें।


हल्की हवा के स्पर्श से लहराती हैं फुहार बनकर,

फूलों की पंखुड़ियों पर टिकी रहती हैं मुस्कान बनकर।


सुबह की ये ताज़गी मन को नई उमंग दे जाती,

मनमोहकता की यह भाषा हर दिल को छू जाती।


क्षणभर की मेहमान बनकर भी ये अमिट छाप छोड़ जातीं,

धरा के आँचल में चुपके से अपनी कहानी बुन जातीं।


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