नमन है बारंबार
नमन है बारंबार
लिखा नाम गगन पर जिसने और धरा पर प्यार
ऐसे बलिदानी को नमन है बारंबार।
वो वीरांगनाएँ थी ,हटी नहीं डटी रहीं ।
थर-थर काँपे दुश्मन उनसे ले खड्ग तनी रहीं।
कहाँ डरे वो अंग्रेजो से ,जाकर घर में मारा था।
जनरल डायर नाम था उसका ,उस दुश्मन को ऊधम ने सबक सिखाया था।
बम फेंक कर खड़े रहे ,फाँसी का फंदा चूमा थे।
आजादी के दीवाने थे,वो आजादी के परवाने थे।
वो बालक भी अभिमानी थे , जो ज़रा न हिचकिचाये थे ।
कोई चुना दीवारों में,कोई बम से उड़ायें थे।
छोटी छोटी कन्याएँ भी साहसी और निर्भय थी।
डरी नहीं ,डिगी नहीं तोप से जिन्हें उड़ाया था।
कुछ ऐसे गुमनामी में काम बड़े कर गये।
आजादी के कारण सरे बाजार खाल को अपनी कुत्तो से नुचवा गये ।
आजादी नहीं थी इतनी सस्ती , जितना तुमना सोचा है।
अंग २ को काट-काटकर इस वृक्ष को सींचा है।
इस आजादी को रखो बरकरार ,यूँ झगड़ना छोड़ तुम ।
कुछ तो दिल में शर्म करों आगे बढ़ना सीखो तुम
इस आजादी को खो न देना ,वतन के मेरे नौजावां।
बढ़ता रहा यूँ क्रांति का ,सदा यह काँरवा।
संभाल के रखो देश को ,यह देश कीमती है।
तन में -मन में मिट्टी, मेरे वतन की महकती है।
वतन की लाज रखी जिन्होंने जान देकर,
तुम भी करो लो कद्र इसकी प्यार देकर।
लिखा नाम गगन पर और धरा पर प्यार
ऐसे बलिदानी को नमन है बारंबार।
