STORYMIRROR

Poonam Chandralekha

Abstract

3  

Poonam Chandralekha

Abstract

नील गगन

नील गगन

1 min
211

छोटी सी खिड़की में था बसा,

कभी बड़ा सा नील गगन,

दिखते बादल, तितली, पंछी,

चंदा, सूरज, तारागण,

मुस्काते मौसम आते,

रंग बहारों के फैलाते।

फिर जाने कैसा बदला मौसम

बिन खुशब, बिन रंगों के,

बिन मिट्टी बिन पानी के

जंगल उगे मकानों के।

बिन किये फिर कोई जतन

मकानों के हठी जंगलों ने 

चुरा ही लिया छोटा सा

खिड़की भर मेरा नील गगन।



Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract