STORYMIRROR

Alka Nigam

Abstract

3  

Alka Nigam

Abstract

नदी

नदी

1 min
340

कहने को मैं एक नदी हूँ

पर बहती हुई सदी हूँ

विपरीत दशाओं में भी जीना

मैं दुनिया को सिखलाती हूँ


दुख संताप से आहत हो के भी

हर पल बहती जाती

मैल न रखती जल में अपने

बहा इसे मैं ले जाती


पीने को देती मैं अमृत

न जल अपना संग्रह करती

मत कर मैला मेरा जल


इसे तुझे ही पीना है

मेरे अंदर भी जीवन है 

सांस मुझे भी लेना है।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract