नारी
नारी
तुम शक्ति हो तुम धीर हो गंभीर हो
तुम जीवन जीने का मर्म हो
तुम न रुकती न थकती, अनवरत चलती रहती हो
पुरुष के जीवन का हर कोना महकाते
उसके दिल की बगिया में प्रेम पुष्प खिलाती हो
वर्तमान में एक सुदृढ़ समाज के लिए
महिला की शिक्षा की ओर कदम अग्रसर हो
महिलाओं की स्वतंत्रता के साथ समाज में एक नई पहचान हो
हर पल जो साथ निभाती वो नारी अपनी स्नेह की खुशबू से मकान को घर बनती नारी
जो कभी ना निराश होती, लहरों की तरह जो हर रोज गिरकर संभलती
नारी का हर क्षेत्र में नव निर्माण हो, उसका ज्ञान बढ़ते,
उसे अपने निर्णय लेने का पूर्ण अधिकार हो
हजारों मुश्किलें आती उसकी जिंदगी में वो ना घबराती,
न हारती, हिम्मत से जो काम लेती
जो हर नई सुबह रचती नई कहानी, चुनौतियों से जो ना घबराती
नारी के विचारों का मह्त्व हो, उसकी भावनाओं का मान हो
समर्पित खुद रहती त्याग समर्पण की जो मुरत हो
दिये की तरह जल सभी के जीवन में रोशनी बिखेरती
अपनी इच्छाओं को मन में लिए मर्यादा में रहती
जो कभी शिकायत न करती
महिला जो सक्षम हो और जीवन हर क्षेत्र में शक्तिशाली बन
आसमां की बुलन्दियों को जो छू जाती हो
जो अपनी स्वयं की सुरक्षा मजबूत कर रखती हो, जो अपनों को देती सम्मान
जो गौरव शाली जीवन जीने के लिये समाज में बदलाव लाती हो
कठपुतली ना समझ, ना वस्तु समझे काम वास की
अपने हमसफर के साथ-साथ कंधे से कंधा मिलाकर जो चलती वो आज की नारी कहलाती
सपने जो देखे खुली आंखो से बुलन्दियों को छू ना हौसलों के पंख से
नामुमकिन को भी जो मुमकिन बनाएगी
वो आज की नारी कहलाती
जो माँ रूप में पीड़ा सहती अनंत भावी वंश का करती निर्माण
कुंती, कौशल्या सी ममता सुत एक समान
कुदरत के आरम्भ से अब तक किए प्रकृति ने सृजन अपार,
निःसंदेह सभी कृति सुंदर किन्तु नारी अनुपम उपहार
अनेकों रूप है नारी के किन शब्दों में करूं बखान,
शब्दों में नहीं संभव नारी महिमा का गुणगान।
