नारी की हुंकार
नारी की हुंकार
बंदिश में अब और न रहूँ
शक्ति स्वयं मैं अपनी गढ़ूँ,
चिंगारी से ज्वाला बनकर,
रण में दुश्मन को मैं दहूँ।
अबला नहीं, हूँ तेज प्रचंड
चट्टानों से भी कड़ी बनूँ,
जो बाधा आए पथ में मेरे,
चूर चूर मैं दमन करूँ।
जंजीरों को तोड़ चली मैं
स्वाभिमान की शान बनूं,
अब न कोई छेड़ सकेगा,
रणचंडी सी धार बनूं।
माँ दुर्गा की ज्वाला बनकर
असुरों का संहार करूं,
काली सम हुंकार उठाकर
अन्याय का समूल नाश करूं।
अब न भय में, मैं जिऊँ
अब न आँसू मैं पीऊँ,
जो आँख उठे मुझ तक,
दृष्टि उसकी मैं क्षीण लूं।
न रोक सकेगा मुझको कोई
मेरी गति मेरी धारा को,
मैं स्वयं रचूँगी भाग्य नया,
मिटा जग के अंधियारे को।
अबला से सबला बनकर,
ज्वाला सी मैं अब धधकूँ,
शक्ति, शौर्य, साहस पाकर,
वज्र सम नभ में दहकूँ।
हर बंधन अब मैं काट चली
अपनी रक्षा स्वयं करूँ,
अधिकारों की ज्योति जलाकर,
इतिहास नया मैं एक लिखूँ।
