मूढ़मति।
मूढ़मति।
समय निकट अब आने को है, उसकी तुझे कुछ खबर नहीं।
मानुष तन का कोई मोल न समझा, जीवन का कोई ध्येय नहीं।।
करता रहा सब अपनों के खातिर, भटक गया संसार सागर में।
अहम भाव में पड़कर उलझा, विषय- वासना के चक्कर में।।
पाप- पुण्य किये बहुतेरे, समझ न सका माया को तेरे।
संचय करना ही जाना अब तक, संकट के बादल छाए घनेरे।।
तप्त हृदय की व्यथा में तड़पूँ, भटक रहा चिर शांति पाने को।
सुख-दुख की अब खबर नहीं, तड़प रहा तुम तक आने को।।
शरण सतसंगत की जिसने है पाई, मानस सदा वही सुखदाई।
पल भर की संगत संतन की, सार जगत का दिया दिखलाई।।
गुरु के दर्शन विरलो को मिलता, वेद- पुराण इनकी ही कहता।
बिन गुरु प्रभु दर्शन हैं दुर्लभ, आत्मज्ञान उनमें ही रमता।।
मांग रहा भीख तुमसे बस इतनी, श्रेयस पथ का मार्ग दिखला दो।
"नीरज" मूढ़मति क्या जाने, आत्मज्ञान की अलख जगा दो।।
