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Amit Kumar

Romance Tragedy

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Amit Kumar

Romance Tragedy

मुक़ाम

मुक़ाम

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तुम्हारी चाहतों से 

दिल का हर मुक़ाम

हम पा गये

सोचा जब भी

दिल ने तुम्हें

तुम रूबरू आ गये......


समंदर कितना भी गहरा हो

मग़र वो शांत दिखता है

नदी जब उसमें मिलती है

मन उसका मचलता है

तेरी तिश्नगी में जलकर

हम कुछ राहत पा गये


तुम्हारी चाहतों से 

दिल का हर मुक़ाम

हम पा गये

सोचा जब भी

दिल ने तुम्हें

तुम रूबरू आ गये......


आओगे जब तुम सामने

दिल की तन्हाई को

आवाज़ बना लेंगे

भँवरे की गुंजन सा

हम इस दिल को हम

तेरे दिल सा बना लेंगे

दिल की अदला-बदली में हम

जाने कहाँ आ गये


तुम्हारी चाहतों से 

दिल का हर मुक़ाम

हम पा गये

सोचा जब भी

दिल ने तुम्हें

तुम रूबरू आ गये......


बनाया हमने भी यारब

रेत पर महल सपनों का

तेरा करम जो हुआ

टिका यह महल सपनों का

सपने कब अपने थे

वो तो बस सपने थे

बड़ी मुश्किल हुई लेकिन

यह हम दिल को समझा गये....


तुम्हारी चाहतों से 

दिल का हर मुक़ाम

हम पा गये

सोचा जब भी

दिल ने तुम्हें

तुम रूबरू आ गये।


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