मुनासिब
मुनासिब
ये सफर कहाँ जा रहा है मगर
ग़म के साये से गुजर कर
मेरा हँसना मुनासिब है
सितारे यूं हीं चमकते रहेंगे
इनकी ओर कदम बढ़ा कर
मेरा खो जाना मुनासिब है
लहरें उलटी बहती है मगर
बूंदों को हाथों में समेटकर
मेरा प्यासा रहना मुनासिब है
इन टेढ़े मेढ़े रास्तों पे
काटों, पत्थरों पर चलकर
मेरा लुढ़कना मुनासिब है
जहाँ पैसों की सुनती है खन खन
इन डिग्रीयों को लेकर
कुचल जाना ही मुनासिब है
जिंदगी की इस भीड़ भाड़ में
किसी की छीतर गयी है नज़म
उसका तड़पना मुनासिब है
किसी का साथ मिलकर बिछड़ गया
कोई बिछड़ कर मिल गया
उसकी ख़ुशियाँ लौटना मुनासिब है
संसार के प्रति मन है कठोर
दर्द, पीड़ा ले रहा है हिलोर
बोझ को काम करना है अगर
तुम्हारा पुनः जनम लेना मुनासिब है
