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Vivek Madhukar

Abstract Inspirational

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Vivek Madhukar

Abstract Inspirational

मुझे शक्ति दो !

मुझे शक्ति दो !

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अफसर, चपरासी, मंत्री, किरानी

हैं राजमद में चूर वे

जनता को हैं समझ रहे

निज पैरों की धूल वे।

कर सकूँ मैं मान-मर्दन इन दुर्बुद्धियों का

मुझे शक्ति दो

हे महिषासुरमर्दिनी, हे चण्डिके !


ये मोटी तोंद वाले सेठ

सहला रहे हाथ से पेट

चावल में कंकड़ मिला रहे हैं

शहद में घोलकर ज़हर

ये लोगों को पिला रहे  हैं।


किरासन, शक्कर, गेंहूँ सब

गोदामों में बंद किये बैठे हैं

और कालाबाजारी करने को

मूँछों को अपनी ऐन्ठें हैं।


उड़ा सकूँ मैं तोते इनके हाथों से

बँटवा सकूँ जनता में अनाज

निकलवा इनके गोदामों से

मुझे शक्ति दो

हे अन्नपूर्णा, हे जगदम्बिके !


मच रहा बलात्कारियों का

चारों ओर आतंक है

खेल रहे वे स्त्री की इज्ज़त से

नहीं इसका उन्हें कोई रंज है

दिखला सकूँ मैं उन्हें

हर नारी में माँ की मूरत


सिखला सकूँ करना उन्हें

माता का सम्मान

बतला सकूँ उन्हें कि जिस

कोख से पाया है जनम

कर रहे हैं वे अधम

उसका ही अपमान

मुझे शक्ति दो

हे भद्रकाली, हे दुर्गे !


निर्धनों पे आ पड़ी है विपदा भारी

धनिकों की गयी है मति मारी

वंचित कर रहा भाई अपने

भाई को हर सुख से


छीन ले रहा अन्न का

निवाला तक उसके मुख से

ला सकूँ मैं इन शठों को होश में

दिला सकूँ हर भाई को

उसका उचित अधिकार

मुझे शक्ति दो

हे भगवती, हे माते !


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