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आ. वि. कामिरे

Abstract Others


3.7  

आ. वि. कामिरे

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मुझे पता नहीं

मुझे पता नहीं

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मुझे पता नहीं

ऐसा क्यों हूँ मैं ?

भीड़ में जीकर भी

उनसे अलग क्यों हूँ मैं ?

मुझे पता नहीं

ऐसा क्यों हूँ मैं ?


शरीर में ताकत न होते हुए भी

दिल मेरा मजबूत कैसे है ?

मुझे पता नहीं

ऐसा क्यों हूँ मैं ?


हारने के बाद भी

दुःख सिर्फ दो सेकंड के लिये रहता है ?

हाँ मुझे सच में पता नहीं

ऐसा क्यों हूँ मैं ?


लोगों के आग्रह करने पर भी

उनमें शामिल होने का

मेरा मन नहीं है ?

हाँ मुझे सच में नहीं पता

ऐसा क्यों हूँ मैं....?



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