मंज़िल।
मंज़िल।
तेरी चाह है
तेरी तड़प है मुझे
तु मिले या ना मिले
मगर इस वक़्त तुझे पाने की ज़िद्द बहुत है
क्यूंकि तु ही वो आखिरी ख्वाहीश है।
क्यूंकि तु ही वो आखिरी ख्वाहीश है।
पंख खोल कर तेरी ओर निकली हूं
हमसफ़र तो कोइ नहीं
बस अकेले चली हूं
राहों में तेरे फूलों का नहीं
कांटों का भरमार है
ठोकरें भी आपार है
ख्वाहिशो में बाते तुझसे तमाम होती है
हकीकत में मुलाकात बाकी है
हां तुझे पाना आसान नहीं
मगर तेरे इम्तिहानों से डर जाऊं मैं
मेरे हौसले कि मकान इतने कच्चे भी नहीं
हां ताज़्जुब होता है
जब हर मोड़ पर मुश्किलों से मुलाकातें होती है
मगर सच ये भी है
अब ये कदम रुकते नहीं
और इनके सामने हम झुकतें नहीं।
सबने तो पाया है तुझे
अब मेरी है बारी
करनी है तुुझसे यारी
तमन्ना तेरी करती हूं मैं हर पल
अब बस तू मिल जाए इस पल.................
I hope ham sab ki wishes jaldi puri ho jaaye
