मन वसंत
मन वसंत
कहा फूल ने पेड़ से
कैसा लगता होगा
जब हम झड़ जाते होंगे ?
कहा पेड़ ने मुस्कुरा कर
यह तो जीवन चक्र है
मैं इसका आदि हूँ
मन को समझा लेता हूँ ।
वसंत बीत जाने पर
मन उदास हो जाता है
तुम बिन अकेला हो
पक्षियों के कलरव से
अपना मन बहलाता हूँ।
जब तक तुम साथ रहते हो
मन खिला खिला सा रहता
तुम्हारी ख़ुश्बू से आँगन
महका महका रहता है
इसी आस पर समय बितता
अगली वसंत पर भर जाऊँगा।
अगला वसंत आने पर
मेरी ख़ुशियाँ लौट आती है
पर मेरे जीवन दाता का
आँगन में लगाने वाले का
इस घर के स्वामी का
वसंत न जाने कहाँ गया
पतझड़ यहाँ बस गया ।
मेरी उम्र का बेटा उसका
उसके जन्म पर मुझे लगाया
दोनों को उसने श्रम से सींचा
दोनों को साथ में बढ़ता देख
फूला नहीं समाता था
वह मानव मैं पेड़ मूक
फिर भी हर बात मुझे बतलाता
मैं भी ख़ुद को बेटा मान ख़ुश होता।
इक दिन बेटा विदेश गया
लौटकर फिर न आया
पत्नी भी स्वर्ग सिधार गई
पर उसका न संदेशा आया
कितने वसंत बीत गए पर
उसके जीवन में न आया वसंत
मेरी छाँव में बैठकर वह
हर आहट पर चौंकता
राह तकता घड़ी -घड़ी ।
मैं हर वसंत खिल उठता हूँ
पर उसे देख रोता हूँ
अब तो तसल्ली भी न देऊँ
किस आशा से उसे कहूँ
यह आँगन खिल जाएगा
बेटा उसका लौट आएगा
मुझे भी बेटे सा पाला
हवा छाया ख़ुशबू देता हूँ
प्रभु से उसके मन वसंत के
खिलने की पूजा करता हूँ।
