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सोनी गुप्ता

Abstract

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सोनी गुप्ता

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मन के भाव

मन के भाव

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हम सब के मन के भाव ऐसे जैसे जी रहे दोहरा रूप,

देखो आज हर व्यक्ति का बदल गया कैसे स्वरूप I


आज समाज में मन के भाव नक़ाब की तरह बदलते हैं,

कई बार देखा है हम अपनी बात पर ही नहीं चलते हैं I


विचारों की इस भाग दौड़ सब कुछ जैसे बदल गया है

मन ने चाहा कुछ करना पर कुछ और ही कर रहा है I


अपनों को खुश रखने की मजबूरियाँ मन के भाव बदल रहा है,

परिवार को खुश रखने की खातिर आज इंसान भी बिक रहा है I 


रोजमर्रा के कामों में जुटा हुआ है, काम के बोझ तले दब रहा है,

पर घर पर अपनों संग हर दर्द छुपाए एक अलग ही मुस्कान है I


सोचा था मंजिल अपनी पा ही लूँगा, दुःख अपनों को कभी न दूंगा,

पर जो सोचो वो कब होता है, गरीब तो गरीबी पर रोता है I


हर रिश्ता निभाने में मन के भावों का खेल अजब ही होता है,

अपने सपनों को छोड़ वह रिश्तों को अपने कन्धों पर ढोता है I


मन में बसे थे जो सतरंगी सपने वो सब अब कितने दूर हुए,

हम अपने दुखों को छुपा कर खुश रहने को मजबूर हुए I


क्या- क्या सोचा था जीवन में पर क्या हो जाएगा ये न सोचा था,

खुशियों का गला दबाकर हम अपने मन भाव बदल देंगे I



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