मजदूर
मजदूर
वक्त और हालात से मजबूर है
कितना बेबस मजदूर है।
दो जून की रोटी के खातिर
सदा अपनों से रहता दूर है
कितना बेबस मजदूर है।
अपनों की खुशियों के खातिर
सब कुछ करने को मजबूर है
कितना बेबस मजदूर है।
दिन-रात करता कड़ी मेहनत
पर मिलता न फल अनुकूल है
कितना बेबस मजदूर है।
भूखा-प्यासा दिन-रात है चलता
मंजिल न जाने कितनी दूर है
कितना बेबस मजदूर है।
सूनी आंखों में सजाएं थे जो सपने
अचानक हुए सब चूर-चूर हैं
कितना बेबस मजदूर है।
