मजदूर की दिल की बात
मजदूर की दिल की बात
मजदूर हूं लेकिन लोग मजबूर क्यू समझते हैं
मुझे नहीं जरूरत उनकी
उनको जरूरत है मेरी
फिर मुझे इतना लाचार क्यू समझते हैं।
जितना कमाता हूं उसको ही अपना समझता हूं
बनाता हूं महल पर अपनी झोपड़ी को ही अपना समझता हू
संतोषम परम सुखम पे निर्भर रहता हूं
पैसों का भूखा नही हूं
अपनी मेहनत के दम पे खुश रखता हूं सबको
हमे लाचार मत समझना , लाचार क्यू समझते है
हम मजदूर न हो तो आपकी जीना दुभर हो जाए
हम घर न बनाए तो आप बेघर हो जाए
हम सड़क ना बनाए तो आपका चलना दुभर हो जाए
हम फैक्ट्री में काम ना करे तो आप कंगाल हो जाए
हम खेतो में काम ना करे तो आप भूखे रह जाए
मेरे बिना आपका कोई काम हो सकता नही
तो हमे ही लाचार और मजबूर क्यू बताते हो
हमे लाचार और मजबूर क्यू समझते है।
हम है तो तुम्हारी किस्मत है
तुम्हारी किस्मत हम चमकाते है
हम है तो तुम्हारा पेट भर रहा है
तुम्हारे लिए फसल हम उपजाते है
हम है तो तुम कपड़े पहन रहे हो
तुम्हारे लिए कपड़े हम बनाते है
हम है तो तुम खुश हो
तुम्हारी हर खुशी को अपनी मेहनत के दम पे पूरा करते है
फिर हम लाचार नही मजबूर नही समझना
हम मेहनत करके अपने परिवार को खुश रखना जानते है
अब हम भी अपने बच्चो को पढ़ा रहे है
उन्हें आगे बढ़ा रहे है
अब मजदूर का बच्चा मजदूर नहीं बनेगा
उन्हें भी हम अफसर बना रहे है
अब रिक्शा चलाने वाले का बच्चा रिक्शा नही चलाएगा
अब हम भी उन्हें आई ए एस ऑफिसर बनायेगे
और अपनी लाचारी और बेबसी को दूर भगाएंगे
अब हमारा यही है नारा
मजदूर का बेटा बेचारा नही बनेगा
पढ़ लिख कर आगे बढ़ेगा।
