महिला
महिला
है जब सूरज सा तेज़ तुझमें और खुद साक्षात दुर्गा और काली का रूप हो,
फिर क्यों अंधेरों से डर जाती हो।
जब सजाई है सूरज की लालिमा अपने माथे पर,
फिर क्यों अपने घर की देहलीज़ पार करने में सकुचाती हो।
काली के काजल का श्रृंगार किया जब अपनी आँखों में,
फिर क्यों किसी की निर्लज़्ज़ आँखों से यूँ ही नग्न हो जाती हो।
जब धारण किये हो अडिग आत्मसम्मान का परिधान,
फिर क्यों आवारा हवा के झोको में अपने दुपट्टे को उड़ जाने देती हो।
प्रगति के पथ पर पुरषों के साथ कदम से कदम मिला कर चलने का दौर है आया,
और एक तुम हो की समाज का सामना करने से कतराती हो।
है जब सूरज सा तेज़ तुझमें और खुद साक्षात दुर्गा और काली का रूप हो,
फिर क्यों अंधेरों से डर जाती हो।
