महा गौरी का संदेश
महा गौरी का संदेश
आज स्वर्ग से श्वेत आँचल लहराये
आगाज हुआ डमरू का,
सजी वृषभ की सवारी
निकली महागौरी ,
त्रिशूल हवा में लहराती।
इस आठ वर्षीय देवी की ,
महिमा बड़ी निराली
एक हाथ से संकट हरती
दूजा बर मुद्रा धारी,
निकली शांति के देवी की पालकी।
चिंतित मुद्रा सोच रही ,
पृथ्वी पर बड़ी अशांति
आज कोरोना को शांति का पाठ पढ़ाऊँगी।
पता नहीं कितनी ताकत फैलायेगा,
जाने कितनी और बलि चढ़ायेगा?
राह में टकरा गयी देवी,
मद में चूर निशाचर से,
आखिर पूछ बैठी इस असुर से।
ऐसी कैसी प्यास है तेरी?
क्या जग में कोई माँ नहीं तेरी,
इसीलिए नर पिशाच बना तू घूम रहा,
जन जन में भय समा रहा।
सुन देवी का तिरस्कार शब्द
कोरोना जोर से हंकार उठा,
देवों का भी सिंहासन डोल उठा।
मंदिर मस्जिद गिरिजाघर ने बाँट लिया भगवान को,
धरती बांटी सागर बंटा बाँट लिया मां बाप को,
इसीलिए अब मैंने अपना छ ल दिखलाया।
मैं भी देखूं मंदिर मस्जिद
गिरिजाघर से कौन बचाने आया।
ये मुझको क्या समझायेंगे,
और क्या मुझको सबक सिखायेंगे।
मानव होकर मानवता भूल गये,
इंसान होकर इंसानियत भूल गए,
मुझको क्या मेरी हैवानियत बतलायेंगे?
कैसे ना याद रहा इनको,
हर माँ से बढ़कर है भारत माता,
हर प्रेम से बढ़कर है देशप्रेम,
हर धर्म से बढ़कर है मजहब का धर्म।
सुन इस असुर की बात निःशब्द हो गई देवी,
राक्षस होकर भी कितना गूढ़ ज्ञान दे रहा,
धरा पर नर ही नर को सता रहा।
हे मानव
इस वरदान का तू पात्र नहीं,
पर कोरोना का भी इस पर कोई अधिकार नहीं।
