STORYMIRROR

Ruchika Rai

Abstract

4  

Ruchika Rai

Abstract

मेरी कविता

मेरी कविता

1 min
396

लिखती हूँ

कुछ बातें ,कुछ जज्बातें,

कुछ कमजोर पड़ जाते जीवन के लम्हातें।


लिखती हूँ

कुछ हँसी,कुछ खुशी,

कुछ अपने हिस्से में आई जीवन की बेबसी।

लिखती हूँ

कुछ उदासी,कुछ उबासी,

कुछ लम्हें जिन्हें पाकर भी रही मैं प्यासी।


लिखती हूँ

कुछ पाना,कुछ खोना,

कुछ घटनाएं जिनमें चाहती थी खुलकर रोना।

लिखती हूँ

कुछ प्रीत के गीत,

कुछ हसीन मुलाकातें जिनमें चाहत रही मनमीत।


लिखती हूँ

कुछ सपने,कुछ अपने

कुछ सपनों में ही लगे बेहद खास अपने।

लिखती हूँ

कुछ ज्ञान,कुछ विज्ञान

कुछ ऐसी घटनाएं जिनसे बना कोई महान।


लिखती हूँ 

कुछ मर्ज,कुछ दर्द

कुछ दर्द में बना कोई मेरा बेहद हमदर्द।

लिखती हूँ

कभी मन की घुटन,कभी कोई चुभन

कभी बाहर के मौन पर भारी पड़ते अंदर के शोर को।


लिखती हूँ

कभी खाली हाथ,कभी तन्हा रात

कभी कोई न दे रहा हो जब मेरा साथ।


लिखती हूँ

रीते मन को, बेबस तन को

कभी सजल होते हुए नयन को।

बस यूँ ही लिखती रहती

हर लम्हें हर हालात को।


मेरा लिखना मेरी अंतरात्मा की आवाज है,

जैसे संगीत की धुन पर बजता कोई साज है।

दिल के कोने छुपा कोई राज है।


जो नहीं था कल या फिर नहीं होगा कल

यह तो सिर्फ आज है,

यह तो सिर्फ आज है।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract