मेरी कलम
मेरी कलम
लिखते लिखते अचानक
मेरी कलम टूट गई
विचारों का बवंडर
उमड़ता आ रहा था
कुछ सुख की धूप
कुछ गम के बादल भी थे
जर्जर शरीर से
उम्मीदों के पत्ते टूट रहे थे
पर वक्त की स्याही से
जीवन के पन्ने पर
मैं लिखता जा रहा था
लिखता जा रहा था
पन्ना भर चुका था
स्याही खत्म हो चुकी थी
कलम बेहद थक चुकी थी
और मैं लिखता जा रहा था
और यूं ही मेरी कलम
अचानक टूट गई
बड़ी देर तक बैठा रहा मैं
चुपचाप उसके पास
मेरी कलम अब मुक्त हो चुकी थी।
