मेरी कहानी, मेरी ज़ुबानी
मेरी कहानी, मेरी ज़ुबानी
बनाने अपनी एक नई पहचान,
उड़ चली मैं ऊँचे आसमान,
सोचा था मैंने, होगा आसान,
उड़ पाऊँगी मैं पंछी समान।
उड़ी उतना, थी जितनी डोर,
छू नहीं पाई आकाशीय छोर,
और जब बादल छाए घनघोर,
खींची गई नीचे की ओर।
मैं पतंग, डोर मेरा परिवार,
जिनसे जुड़े जीवन के तार,
जिनका है मुझ पर अधिकार,
बंधन नहीं, यह है प्यार।
बच्चों, "तुम भी ऐसा बनना,
परिवार के संग ही रहना,
न हीरा, न स्वर्णिम गहना,
यह वरदान, न इसकी तुलना।
