STORYMIRROR

Gagandeep Singh Bharara

Abstract Classics Inspirational

4  

Gagandeep Singh Bharara

Abstract Classics Inspirational

मेरे सपने

मेरे सपने

1 min
343

कभी जीते थे हम किसी और के लिए,

कभी मरते भी थे किसी और के लिए,


अब करवट शायद बदल रही है,

हवाओं ने भी रुख मोड़ लिया है,


अब खुल के जीने का मौसम है आया,

खुद पर तव्वजो देने का सेहर है आया, 


अब बीती जो बातें वो भूल गया हूँ,

अपने अंतर्मन में खुश हो रहा हूँ,


देखे जो सपने वो तलाश रहा हूँ,

खुल के अपने लिये जी रहा हूँ।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract