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VIVEK ROUSHAN

Abstract

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VIVEK ROUSHAN

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मेरे अन्दर एक आग जल रही है

मेरे अन्दर एक आग जल रही है

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मेरे अन्दर एक आग जल रही है 

रोज ये आग मुझे झुलसा जाती है 

और मैं बाहर खड़ा यह सोचता हुँ 

की कहीं ये आग मुझे 

एक दिन जला न दे 


डरता हूँ इसलिए नहीं कि

मुझे मरने से भय लगता है,

या मुझे आग से नफरत हो गई है 

बल्कि इसलिए की शायद 

मैं दुनिया की बातों

को समझ न पाऊँगा,


सच क्या है कभी 

यह जान न पाऊँगा,

पानी के स्पर्श से 

मैं वंचित रह जाऊँगा,

आग और पानी के मिलन 

को कभी देख न पाऊँगा।


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