STORYMIRROR

VIVEK ROUSHAN

Abstract

4  

VIVEK ROUSHAN

Abstract

मेरे अन्दर एक आग जल रही है

मेरे अन्दर एक आग जल रही है

1 min
484

मेरे अन्दर एक आग जल रही है 

रोज ये आग मुझे झुलसा जाती है 

और मैं बाहर खड़ा यह सोचता हुँ 

की कहीं ये आग मुझे 

एक दिन जला न दे 


डरता हूँ इसलिए नहीं कि

मुझे मरने से भय लगता है,

या मुझे आग से नफरत हो गई है 

बल्कि इसलिए की शायद 

मैं दुनिया की बातों

को समझ न पाऊँगा,


सच क्या है कभी 

यह जान न पाऊँगा,

पानी के स्पर्श से 

मैं वंचित रह जाऊँगा,

आग और पानी के मिलन 

को कभी देख न पाऊँगा।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract