STORYMIRROR

Zuhair abbas

Abstract

3  

Zuhair abbas

Abstract

मेरा कूसूर

मेरा कूसूर

1 min
389

क्या बस इतना था कूसूर कि उस पर भरोसा किया

हर शह हर एहसास से ज़्यादा उसे अपना किया।


एक बार तो मेरे सवालों का जवाब मुझे दिया होता ‌

ऐसे रूख़ मोड़ कर तो ना बीच राह मे मुझे तन्हा किया होता।


माफी ना सही सज़ा ही मेरे कूसूरों कि मुझे दी होती

उम्र भर के लिए तो ना मुझसे खुद को जुदा किया होता।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract