मैं तो बस इक बूँद हूँ
मैं तो बस इक बूँद हूँ
छलके हृदय में अमृत कलश, अंत:करण में बहता गरल है
मैं तो बस इक बूँद हूँ जग में, क्षुद्र बस इस भव समुद्र का।
देखता मुख धवल पूरणमासी का
उल्लासित हो उठी उमंगें
उछली आतुर हो नीलगगन तक
मधुर मिलन को तरल तरंगें
जन्मों – जन्म की पिपासा लिये हूँ, तृष्णा जीवन भर का।
अश्रुकण – सा मेरा जीवन सारा
भरा खारापन इसमें इसलिये है
पीकर मैंने कई अग्नि-शिखायें
भू – धात्री पर जीवन दिये हैं
अखिल सृष्टि को द्रवित पाशों से, दिये अनुपम मणि सौंदर्य का।
जीवन लहरों में भरा कोलाहल है
तलहटी पर मंडलाकार भँवर चलते
डूबते उतराते रहते हैं इसमें
हृदय में अनगिनत सपने पलते रहते
हमनें व्यथा व्यक्त की हर पल, गर्जन -तर्जन कर भूमण्डल का।
युग – युगान्तों के नवीन संवेदनायें
चुभते रहे कंटक आँचल में
अनन्त्य महाविल के इस छाया में
सजीले रेखाओं के आलेख्य सिमटने में
सौंदर्यता तो नश्वर है, रहा है कौन अनश्वर सृष्टि का।
