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Kanchan Shukla

Inspirational

4  

Kanchan Shukla

Inspirational

मैं स्त्री हूं ?

मैं स्त्री हूं ?

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मैं स्त्री हूं ,

क्या मैं स्त्री हूं ?

यह प्रश्न स्वयं से करना होगा,

मैं स्त्री हूं,

इस शब्द की विवेचना करनी होगी,

मैं शब्द का प्रयोग अपने लिए,

दूसरी स्त्री के लिए तुम शब्द का प्रयोग,

जब तक स्त्रियां करती रहेगी,

तब तक अपने वजूद की लड़ाई,

अकेले ही लड़ती रहेगी,


इस शब्द का अर्थ उन्हें समझना होगा,

मैं को साथ लेकर चलना होगा,

तुम को पीछे छोड़ आगे बढ़ना होगा,

मैं स्त्री हूं,

मैं निर्मात्री हूं,

एक नये अस्तित्व की,

मैं पालन करता हूं,


उस वजूद की,

जिसको अपने गर्भ में रखकर,

सिंचित करती हूं अपने लहू से,

मैं दुष्टों की संहारकार्ता भी हूं,

परंतु जब प्रेम, ममता, करूणा,

भावनाओं के सागरिका में बहने लगती हूं,

तब अपने दंड देने के कर्तव्य को भूल जाती हूं,

हमारी कोमल भावनाएं,

हमारे लिए घातक सिद्ध होती हैं,

अपने मोह और आसक्त का दंड,

स्वयं ही भोगती हूं,

यह भी सत्य है कर्म फल हर व्यक्ति को, भोगना पड़ता है,


मैं स्त्री हूं,

यह हमें समझना होगा,

हमारे ऊपर समाज के निर्माण का दायित्व है,

उसे बखूबी हमें निभाना होगा,

अपनी भावनाओं की कमजोरी पर,

अंकुश लगाना होगा,


अपने वजूद से उत्पन्न रावण को,

स्वयं जलाना होगा,

जिससे वह रावण,

किसी सीता का दामन छू न पाए,

मैं स्त्री हूं यह समझना होगा,

तुम स्त्री हो यह भूलकर,

एक साथ मिलकर,

अपने अस्तित्व के लिए शस्त्र उठाना होगा,


तभी पुनः स्त्री के अस्तित्व को,

स्वीकार किया जाएगा,

तब स्त्री एक बार पुनः सम्मान और गर्व से

मुस्कुराते हुए कहेंगी,

मैं स्त्री हूं !! मैं, मैं हूं !

मैं सृजन कर्ता हूं !

मैं पालन कर्ता हूं!!

मुझे मज़बूर न करो की मैं संहारकर्ता बनूं,

मैं स्त्री हूं मुझे ममतमयी स्त्री ही रहने दो ?


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