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संजय कुमार

Abstract

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संजय कुमार

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मैं शराब हूं

मैं शराब हूं

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मैं शराब हूं केवल एक नाम का

हमेशा होता हूं इंसान के काम का

चाहूं जब भी अगर किसी को

नहीं छोड़ता किसी भी काम का

मैं शराब हूं केवल एक नाम का


दुख को दो पल में मैं हरण करूँ

सुखों का मैं ढेरों अंदाज़ दिलाऊ

हर ग़म का मैं बस एक सहारा

मेरा यही है एक अंदाज़ निराला

मैं शराब हूं बस एक नाम का


न चाहूं भला बुरा किसी का 

न चाहूं किसी का नुकसान

मेरा तो बस काम है इतना

हर डर में भर दूँ एक जान 

मैं शराब हूं केवल एक नाम का


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