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Arunima Bahadur

Inspirational

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Arunima Bahadur

Inspirational

मैं पगली

मैं पगली

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नही जानती,

कौन से शब्द प्रवाह,

कब मेरे उर में आ,

भाव संवेदना उकेरते है,

एक अनजान,पगली सी मैं,

लिख जाती हूँ,

भावों का वो सागर,

जो पवन आ,

कर्ण रस दे देती हैं,

और

लिख जाता है,

कही कोई अदृश्य,

मुझमें उत्तर कर,

शब्दो की वो माला,

जो कविता का रूप ले लेती हैं,

मैं तो कल भी अनजान थी,

एक पगली,नादान थी,

आज भी हूँ,

और कल भी रहूंगी,

सुनने को उस,

अदृश्य सत्ता की जादूगरी,

जो बनातीं है,

आ इस वसुधा पर,

कलम की वो बाजीगरी,

मैं तो वही हूँ,

एक पगली सी,अनजान सी,

सदा से निःशब्द,

सदा से निःशब्द।।


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