मैं नीर भरी दुखी बदली के संदर्भ में आज की नारी
मैं नीर भरी दुखी बदली के संदर्भ में आज की नारी
महादेवी वर्मा के सान्ध्य गीत की "मैं नीर भरी दुख की बदली" कविता में नारी के भीतर के दर्द, त्याग, और संवेदना को बेहद मार्मिक रूप में प्रस्तुत किया गया है। इसे आज की नारी के संदर्भ में यदि देखें, तो उसकी स्थिति कुछ बदली जरूर है, परंतु संघर्ष और भावनाओं का गहरा तालमेल अब भी बना हुआ है। यह कविता आज की नारी की आत्मनिर्भरता, साहस और संघर्ष की भावना को दर्शाती हुयी नारी के भीतर की गहरी संवेदनाएँ, उसके ममत्व को गहरे भावनात्मक स्तर पर उजागर करती है।
मैं अब भी नीर भरी दुख की बदली,
मेरे अन्त:धधके एक अग्नि अधजली।
विरह, वेदना,व संताप की अब रवानी,
पर मैं चुप नहीं, मेरी चुप्पी ही कहानी।
मैं आज भी नीर भरी दुख की बदली,
पर मेरे हृदय में है साहस की कली।
अतीताधंकार को अब मैं लांघ चुकी,
मैं आज की नारी, गगन थाम चुकी।
मैंने सहे हैं आँसुओं के अपार सैलाब,
इन लहरों में डूबी नहीं,देखते ख्वाब।
दर्द मेरा गहना,पहन इसे नहीं झुकती,
हर कंंटक बना मोती, जीवन सृजती।
आँसुओं ने आँखों को था ढक दिया,
उन्हीं बूँदों से स्वप्नों को सजा लिया।
हार ने निखारा मुझे, दुख ने सँवारा,
मैं मौन नहीं, मेरे अश्रु बने अंगारा।
संसार वही,पर दृष्टिकोण बदल गया,
त्याग है नींव, हक पहचान बन गया।
मैं दुख की बदली,जलफुहार बन गई,
हर हृदय को सींच,मैं स्पंदित कर रही।
न जाने कितने बंधन मेरे पैरों में बंधे थे,
हर बेड़ी मैंने गति क्रम से तोड़ जिये थे।
मैं अब भी वही नारी कोमल,पर अदम्य,
हर पीड़ा से सीख,आँसू संबल अगम्य।
अब न कोई शिकवा, न कोई पुकार,
बन खुद अपनी आवाज़, मेरे गुबार।
मैं दुख की बदली न,अब मैं ज्वाला,
अंधेरे में भर देती अपने दम उजाला।
त्याग मेरा आभूषण,हक की आवाज़,
मैं बोलूं, बढूं, बनूँ भविष्य में हो नाज।
अब मैं केवल आंसू में ही न बरसती
हरदर्द की लौ से, रौशन जहाँ करती।
नहीं मौन किसी भी पिंजरे में मैं अब,
सपनों को खुद लिखूँगी धरा पर जब।
मैं हूँ नारी, हर युग में बदलने वाली,
स्वप्नमसि से, दुनिया को गढ़ने वाली।
