STORYMIRROR

Shalini Wagh

Abstract

4  

Shalini Wagh

Abstract

मैं नदी

मैं नदी

1 min
368

प्रवाह के साथ दिशा बदलती हूँ

सब गंदगी समेटकर

जिसमें जाती हूँ उसको समा लेती हूँ


कंकर की एक मार से

लहरों को जन्म देती हूँ

नदी किनारे घुमते वक्त

कोई मेरा हाल भी पूछता है ?


क्या किसी के मन में

कभी सवाल उठता है ?

बहती रहती हूँ

कभी मैं भी थक जाती हूँ।


दिल को सिर्फ एक बात चुभती है

मेरे वजह से किनारे दुरिया सहते हैं

काश मैं कुछ कर पाती,

अपने हाथों से किनारों की दूरियां मिटाती।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract