अनजान रिश्ते
अनजान रिश्ते
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कुछ रिश्ते बनते है अपने आप
ना होता है उसका कोई नाम
ना कुछ पता
कभी कभी तो समझ में भी
कुछ नहीं आता
दिल के पार जाकर
अपना सा लगता है
रिश्तों की माला
धागों में पिरोई जाती है
कश्मकश जिंदगी की
चलती रहती है
यही अनकहे रिश्ते खुशी
देखकर गुम हो जाते है
तो कभी साथ भी रहते है
मन में एक सवाल उठता है
हमारे अपनों से उम्मीद
करना बेफीजूल होता है
तो रब ये रिश्ते बनाता ही क्यो है ??
