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mahak gupta

Abstract

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mahak gupta

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मैं कला प्रेमी ठीक हूँ

मैं कला प्रेमी ठीक हूँ

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पहले कला प्रेमी थी तो

हर रिश्ते में चाशनी सी मिठास थी।


जब से गणित समझने लगी,

रिश्तों की मिठास गायब होने लगी।


पहले हर रिश्ता अपना लगता था,

अब हर रिश्ता मतलब का लगता हैं ।


पहले रिश्ते मन से बंधते थे,

अब रिश्ते धन से बंधते हैं ।


पहले रिश्तों का औदा होता था,

अब रिश्तों का सौदा होता हैं।


पहले रिश्ते संजोने के लिए

खामोशी काफी थी,अब अल्फाज भी कम हैं।


पहले हर रिश्ता अहम था,

अब रिश्ता होना ही वहम हैं।


इसी उलझन में उलझी हुई हूँ

अगर, मैं गणित नहीं समझूंगी तो,


रिश्तों के पीछे छुपी काली परछाई के

सच से रूबरू नहीं हो पाऊँगी।


और अगर, मैं गणित समझ गईं तो,

कहीं, मेरे रिश्तों की महक खत्म न हो जाए।


इसीलिए, मैं तो कला प्रेमी ही ठीक हूँ।


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