मैं खुद से प्यार करने लगी हूं
मैं खुद से प्यार करने लगी हूं
मैं खुद से प्यार करने लगी हूं
बातें हजार करने लगी हूं ।
ढूंढती नहीं है मेरी खुदगर्जियां
अब अपनों में गैर को
और गैरों में अपनों को ।
दीवारों से बांटती नहीं है
अपने दुःख-दर्द और तन्हाइयां ।
एक तो वो पत्थर दिल
फिर कान लगाकर सुनने की
आदत में शुमार।
न जाने कब-कहां
लगाई-बुझाई के ईंधन में
माचिस की तीली जलाकर
जीना कर दें दुश्वार ।
खेलते हैं मेरे अश्क तकिये से
जो अपनी नरम मुलायम
रूई के फाहों में
दफन कर लेता है,
गम-ए-सहर के सारे राज।
कुछ कहने वाले
लोगों की गलियों से
थोड़ी दूरी बनाकर चलने लगी हूं।
शीतल, निर्मल नदिया सी
अपनी ही रौ में
बह रही जीवन धारा पर
एतबार करने लगी हूं।
मैं खुद से प्यार करने लगी हूं
बातें हजार करने लगी हूं
