STORYMIRROR

बेज़ुबानशायर 143

Abstract Romance Fantasy

4  

बेज़ुबानशायर 143

Abstract Romance Fantasy

मैं जब जब तुम्हे सोचता हूँ

मैं जब जब तुम्हे सोचता हूँ

1 min
258

मैं जब जब तुम्हें सोचता हूँ

हर लम्हे से मैं ये पूछता हूँ

की क्यूँ मैं तुम्हें इतना सोचता हूँ

लम्हे मुस्कराते हैं और खामोशी बन जाते हैं


फिर मैं तुम्हें सोचता हूँ

और खामोशी से पूछता हूँ

जब भी उसे मैं सोचता हूँ

तुम क्यूँ आते हो ?


खामोशी कुछ देर ठहरती है

फिर पलकों पे बूंद बन जाती है

जब जब तुझे मैं सोचता हूँ

खामोशी बूंद क्यूँ बन जाती है


मैं इन बूंदों से पूछता हूँ

बूंद कुछ देर पलकों पर रुक कर

फिर एक सोच बन कर निकल जाते हैं



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract