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Neeraj pal

Abstract

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Neeraj pal

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मैं हूँ तिनका बहते पानी का।

मैं हूँ तिनका बहते पानी का।

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जीवन रूपी सागर में, खोज रहा था प्रियतम मन का ।

सागर की लहरों में, भटकता -फिरता यह जीवन मेरा,

 कब होगा सफल यह जीवन, भटक रहा था मन मेरा,

 बहता जा रहा था तीव्र गति से, पर मिल ना सका, मैं हूँ जिनका ।


इन लहरों के बहकावे में, तट अपना मैंने छोड़ दिया,

 समझ ना सका इस छलावे को, इन से ही नाता जोड़ लिया,

रम गया इनमें इतना, छीन लिया चैन अब मन का ।


भूल गया सुध -बुध अपनी, समझ ना सका किसने है भरमाया, 

आकर्षण ने ऐसा जाल था फेंका, लहरों ने अपने में ही समाया,

 क्या होगा परिणाम अब मेरा, विवेक-शून्य ज्ञान था मन का।


 मन तो ठहरा चंचल- चितवन, चला मापने गहराई सागर की,

 सुन रक्खा था वही मिलेंगे, आवाज थी यह अंतर्मन की,

 मैं मूर्ख यह समझ ना पाता, यह भी धोखा था चंचल मन का।


 निराशा लिए बहा जा रहा था, फिर भी मिलन की आस लगी थी, 

"डूबते तिनके" को सहारा देने, एक करुणामई लहर मिली थी,

 धीर बँधा कर बोली मुझसे, हिम्मत मत हार भ्रम है मन का।


 ले चली एक नई दिशा में, चाहत लिए जिसकी चल पड़ा था,

 पहुँचा दिया गंतव्य स्थान तक, जो जीवन का असली मकसद था, 

शुक्रगुजार हूँ उस लहर का, हल्का कर दिया भार अब मन का। 


भर चुका था मन अब मेरा, जीवन- रूपी सागर की लहरों से, 

जन्म -जन्म से भटक रहा था, मिलने को अपने प्रियतम से,

कृतार्थ हुआ जीवन "नीरज" का, दर्शन पा अपने "सत्गुरू" का।


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