STORYMIRROR

Gantantra Ojaswi

Abstract

4  

Gantantra Ojaswi

Abstract

मैं भारत हूँ

मैं भारत हूँ

1 min
688


अनगिनते घावों को खाकर, 

देखो ! हरा भरा हूँ,

मैं अखण्ड भारत हूँ प्यारे!

किससे कहाँ डरा हूँ!!


भू,नभ, जल की आफत झेली,

है नगेश रखवाला,

देखे कितने युद्ध, सहे पर

डिगा न हिम्मतवाला ।

बलिदानी निज शीश चढ़ाता, 

हाँ! मैं वही धरा हूँ!!


बाहर के आघात सहे हैं,

भीतर के भी भारी,

अपनों ने ही चोटें दी हैं,

कुछ ने की मक्कारी।।

सबको सबका जीवन देने,

कितनी बार मरा हूँ!!


हैं अखण्ड आदर्श हमारे,

और सभ्यता प्यारी,

विपदाओं में एक रहें हम,

भले संस्कृति न्यारी।

एक सूत्र में रहे, रहेंगे, 

संबल यही खरा हूँ!!



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract