मैं ऐसा ही हूँ
मैं ऐसा ही हूँ
मैं अनकंट्रोल्ड स्पीड की गाड़ी सा हूँ,
और हूँ कंट्रोल्ड साइलेंसर सा भी।
मैं कैसा भी रहूं,
परिवार मेरा रहे सुकून से।
कितने ही न्यूरॉन्स सक्रिय हो जाएं,
यही विचार, आखिरकार, फिर उनमें सबसे ऊपर उठ आता है।
मुझे कोई एतराज़ नहीं
अगर मुझे दीवार भी बनना पड़े,
बस इतना कि
मैं खड़ा रहूं—
अपने घर और परेशानियों के बीच,
एक मजबूत क्वांटम बैरियर की तरह।
मैं सख्त हूँ,
इसलिए जल्दी टूट जाता हूँ,
बिन आँसू की आँखें,
जल्दी बंद हो जाती हैं,
पर मेरे इमोशनल एल्गोरिदम में,
रोने का कोड कभी लिखा ही नहीं।
ममत्व की तरह कोई नदी में बहाता नहीं,
मैं उससे तुलना भी नहीं करता,
क्योंकि मैं जानता हूँ,
मैं माँ जितना महान बन नहीं सकता,
वह तो ग्रेविटेशनल फोर्स की तरह
सबको जोड़े रखती है।
पर मैं जो भी हूँ,
अपने सिद्धांत,
अपने विश्वास,
अपने डीएनए में छपे उत्तरदायित्व के साथ,
मैं खड़ा हूँ।
पुरुषत्व में छिपे ममत्व को जताए बिना,
मुझे टूटने में आनंद मिलता है,
मिलता है मृत्यु में एन्ट्रॉपी का संतुलन,
अगर मेरा परिवार निश्चिंत रहे तो।
मैं पुरुष ऐसा ही हूँ,
ऐसा ही रहूंगा—
दमदार,
दम टूटने होने तक।
