अनन्य भक्त
अनन्य भक्त
"अनन्य भक्त" ही प्रभु को भाते, मनचाहा फल वह हैं पाते।
बड़ा ही दुष्कर है ऐसा बनना, प्रभु गीता में यही समझाते।।
द्वेष भाव रहित जो है होता, सबको अपने वह गले लगाता।
सब के प्रति वह दया भाव है रखता, ममता,
अहंकार रहित है होता।।
सुख-दु:ख की परवाह नहीं उसको, समअवस्था में ही रहता।
अपने प्रति अपराधों को भी, दूसरों को सदा क्षमा है करता।।
हर परिस्थिति में संतुष्ट है रहता, मालिक की इच्छाओं पर वह चलता।
समर्थ गुरु की शरण है गहता, वृत्तियों, वासनाओं को दूर है भगाता।।
मन, बुद्धि द्वारा संचित कर्मों को, समर्पित सदा सतगुरु को है करता।
शुद्ध व्यवहार का पालन वह करता, दुर्व्यवहार से उद्विग्न न होता।।
सफलता, असफलता की न कोई चिंता, हर्षित मन सदा ही रहता।
अमर्ष रहित जीवन है उसका, फिकर सदा वह सब की करता।।
भय, उद्वेगों से रहित वह रहता, अपेक्षा किसी प्राणी से न करता।
विकार रहित अंतःकरण उसका, ब्रह्मचर्य का सदा पालन है करता।।
कर्तव्य,कर्म एक भक्ति भाव में, निपुण सदा वह हैं रहता।
अनासक्त एवं निष्पक्ष उसका जीवन है कटता ,संकट से कभी विचलित न होता।।
मुक्त सदा कर्ता पन से रहता, अनुकूलता को प्रभु प्रसाद है समझता।
ईश्वर की इच्छा में वह रमता, कामना शून्य जीवन है कटता।।
शुभ,अशुभ संपूर्ण कर्मों के, फल की कभी चिंता न करता।
मान,अपमान की परवाह न उसको, शत्रु-मित्र को सम समझता।।
निंदा, स्तुति भी सम ही रहते, मननशील सदैव वह रहता।
संचय की कोई परवाह नहीं, हर सूरत में मग्न वह रहता।।
"अनन्य भक्त" की यही पहचान, दिया अर्जुन को प्रभु ने ज्ञान।
नीरज" करता करबद्ध प्रार्थना, दे दो मुझको भक्ति वरदान।।
