STORYMIRROR

Shailaja Bhattad

Abstract

3  

Shailaja Bhattad

Abstract

माटी को सलाम

माटी को सलाम

1 min
37

आओ बुने ख्वाबों को धरातल देते हैं  

आंखों में उतारी तस्वीर से रूबरू होते हैं।

=========== 

आओ ऐसा भारत बनाते हैं जहां आंखों में पानी हो

पलकें नहीं कभी भारी हो, रंजिशों की नहीं कोई गुंजाइश हो

साज़िशों की भी नहीं कोई साजिश हो।

=====

यहां कोई जिंदगी कर्ज पर नहीं जीता

किसी के एहसानों तले दबकर नहीं रहता

आत्मनिर्भर बनने पर फक्र करता है

हिंदुस्तान की माटी को सलाम करता है।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract