माता पिता कहीं नहीं जाते
माता पिता कहीं नहीं जाते
कई बार सोचती हूँ
मम्मी पापा कहाँ चले गए
नहीं देख पाऊंगी कभी उन्हें अब
न ही छू पाऊंगी।
अंदर से आती खुशबू
अहसास दिला देती है
कि माँ यहीं छुपी बैठी है
रसोई में !
दे गई है विरासत में ज़ायका
भाभी के हाथ में।
भैया की आँखों में पापा
छोड़ गए हैं सारा स्नेह
अपनापन और समझदारी।
उन्हें देखते ही सोचती हूँ
अरे! बिल्कुल पापा!
उम्र बढ़ने के साथ साथ
मैं भी तो लगने लगी हूँ
माँ जैसी।
भाने लगा है वो सब मुझे
जिसके लिए ...
असहमत होती थी माँ से।
चेहरा मोहरा, आदतें
सब कुछ तो ले लिया मैने
माँ से।
पापा तो जैसे
घर के कोने कोने में समाएं हैं।
किताबों की अलमारी में
बैठक के सोफे पर
आँगन की चारपाई
डाइनिंग टेबल की कुर्सी में,
बड़े बेटे की आंखों में
छोटे बेटे की बातों में।
और शायद....
उनके बच्चों में भी ज़िंदा रहेंगे
मम्मी- पापा
और बच्चों के बच्चों में भी।
सच, माँ बाप कहीं नहीं जाते
वहीं छुपे रहते हैं
घर के किसी कोने में
भाई के पेट के बल सोने में
छुटकू के रोने में
मेरे चश्मा पहन धागा पिरोने में।
हर पल, हमारे आसपास
बहुत....
बहुत पास !
