STORYMIRROR

माँ मैं कलंक नहीं

माँ मैं कलंक नहीं

1 min
441


माँ मैं कलंक नहीं

कठोर पत्थर हूँ

मुझे सिर्फ़ तराशने की

ज़रूरत

फिर तुम चाहो जैसी

बना लो मेरी मूरत

करोड़ों चोटे खाकर

एक प्यारी मूरत बनती है

निखारने पर कितनी प्यारी

सूरत लगती है

माँ मुझें एक मौका दे दो

इस दुनिया में आने का

ना मैं पिघलूंगी

ना मैं मुरझाऊंगी

मैं कठोर पत्थर

मुझे सिर्फ़ तराशने की

ज़रूरत....



Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract