माँ मैं कलंक नहीं
माँ मैं कलंक नहीं
माँ मैं कलंक नहीं
कठोर पत्थर हूँ
मुझे सिर्फ़ तराशने की
ज़रूरत
फिर तुम चाहो जैसी
बना लो मेरी मूरत
करोड़ों चोटे खाकर
एक प्यारी मूरत बनती है
निखारने पर कितनी प्यारी
सूरत लगती है
माँ मुझें एक मौका दे दो
इस दुनिया में आने का
ना मैं पिघलूंगी
ना मैं मुरझाऊंगी
मैं कठोर पत्थर
मुझे सिर्फ़ तराशने की
ज़रूरत....
