STORYMIRROR

AVINASH KUMAR

Abstract

4  

AVINASH KUMAR

Abstract

मां है वृक्ष समान

मां है वृक्ष समान

1 min
257


वृक्ष व्यथित नहीं होता 

धरा चाहे जितनी कुपित हो

वृक्ष व्यथित नहीं होता 

कितने फूल गिरे शाखों से 

वो हरपल ही सृजन करता


माना पतझड़ का मौसम है 

पर बसंत फिर से आयेगा 

नई कोपलें फिर फूटेंगी 

भविष्य राह दिखायेगा 


साहस भरकर रात को सूरज

सुबह फिर से आयेगा 

जो फैला है घना अंधेरा 

पल में दूर हो जायेगा 


कोयल कूकेगी बागों में 

वृक्ष पुलकित हो जायेगा 

जीवन की इस बगिया में 

जब शोहरत का परचम लहरायेगा।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract