लकीरों के दायरे में
लकीरों के दायरे में
जिंदगी हाथ की
लकीरों सी है
कुछ उलझी हुई
तो कुछ सुलझी ।
बंद मुट्ठी में
क़ैद सी है
और खुली हथेलियों में
आज़ाद पंछी।
कभी अपने
हाथों की लकीरों पर
यकीन मत करना
वरना किसी मोड़ पर
उंगलियाँ साथ छोड़ देगी
क़िस्मत का ग़ुलाम समझकर ।
